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शुरू कीजिए; खत्म कीजिए

किसी भी कार्य को अच्छी तरह से पूरा करने के लिए कई बार हमको उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में लम्बे समय तक करते रहना होता है। लेकिन जब हमारे सामने चलते-चलते बहुत सारे टुकड़ों में अधूरा कार्य पड़ा रहता है तब हमारा मन उसके भार से दब जाता है। जब भी आपसे जितना हो सके जिसे शुरू किया है उसे खत्म करने की कोशिश करें। किसी भी कार्य को खत्म करने से आप पूर्णता के आनन्द के साथ मन की शान्ति का भी अनुभव करते हैं। अपने सारे दिन में इसको आजमाते रहिए। नया काम शुरू करने से पहले शुरू किया हुआ काम खत्म करें और फिर देखिये दिन के अन्त में आपको कैसा लगता है।

 

अपराध बोध से दूर रहिए

अपराध बोध होना जैसे कि हिलती हुई कुर्सी पर बैठना है। हम भावनात्मक रूप से आगे पीछे झूलते रहते हैं लेकिन हम कहीं पहुंचते नहीं हैं। अगली बार जब आप अपने आपको अपराध बोध की कुर्सी पर बैठा हुआ महसूस करें, तो वहाँ से उठ जाइये और किसी अच्छी भावनात्मक जगह पर चले जाइए। कैसे? अपने आपसे पूछिये, सोचिए कि इसके बदले मैं क्या कर सकता हूँ? और उस पर काम कीजिए, कुछ रचनात्मक कीजिए, तब आपको खुद के बारे में अच्छा महसूस होने लगेगा।

 

भूतकाल के बोझ को उतार फैंकिए

अधिकतम भार को ढोते रहना हमें धीमा करते जाता है। सोचें कि अगर आप पर्वतारोहण के लिए जा रहे हो और आपकी पीठ पर बहुत भारी सामान लदा हुआ हो जिसमें बहुत सी अनावश्यक चीजें आपने भरी हुई हो… क्या भूतकाल की नकारात्मक यादों को पकड़े रखने में किसी उद्देश्य की प्राप्ति होती है? आप जैसा जीवन चाहते हो वैसा जीने के लिए आपने जो जीवन बिताया है उसे भूल जाना होगा।

अपने लिए एक सुरक्षित जगह बनाइ

सब बातों से फारिग होकर निश्चिन्त होना हम सभी को अच्छा लगता है। अपने लिए एक शुद्ध स्थान बनाइए। सभी ध्यान आकर्षित करने वाली चीजों से दूर हो जाइए। अपने फोन को बन्द कर दीजिए। कर्णप्रिय संगीत सुनिए। केवल शान्ति का आनन्द लीजिए। समय को अपने तरीके से बितायें। इस समय को आप अभी-अभी हुई कुछ बातों का आंकलन करने में भी बिता सकते हैं। कुछ नये सपनों को बुनिए, या अपने आन्तरिक आत्मा को पर्नजागृत कीजिए।

भय पर विजय

भय आपके आस-पास दिवारें खड़ा करता है। सबसे बड़ी दीवार हमारे वास्तविक स्व और आभास के स्व के बीच खड़ी होती है। भय इस तरह से चिल्लाता है कि वह हमारी स्मृति और व्यवहार को नियंत्रित करने लगता है। लेकिन यह इतना सूक्ष्म भी हो सकता है कि वह हमारे अवचेतन मन के पृष्ठ भाग में लोरी की तरह से चलता रहता है। जिसका कई बार हमें आभास भी नहीं होता है जो हमारी स्मृति को सुला देता है। आध्यात्मिक शक्ति हमें सर्व प्रकार के भय से मुक्त कर देती है।

शक्तिशाली त्रिगुट – धैर्य, सहनशीलता और संतुष्टता

यह तीन शक्तियाँ विशेष रूप से इस दुनिया में रहने के लिए मददगार साबित होती हैं। पहली है धैर्यता और दूसरी है सहनशीलता। मेरे शरीर के साथ अथवा मेरे प्रियजनों के साथ कुछ भी हो जाये मुझे इसे स्वीकार करना ही होगा और उसके साथ जितना हो सके सकारात्मक रूप से निपटना होगा। क्या होगा? क्या हो गया? इस तरह के भय परिस्थतियों को और ही बिगाड़ देते हैं। यह भय मुझसे शक्ति छीन लेते हैं और परिस्थितियों का सामना करने के लिए मदद रूप समझ को छीन लेते हैं। तीसरा है संतुष्टता, यह महसूसता कि मैं ठीक हूँ और सबकुछ ठीक है। यह तीन शक्तियाँ अन्य सभी शक्तियों को हमारे जीवन में कार्य करने देती हैं। उनके होने से हम अपनी सभ्यता और आत्म सम्मान बनाये रख सकते हैं। आध्यात्मिक शक्तियाँ हमारे भीतरी शक्ति को सुरक्षित रखती हैं और स्वयं की आध्यात्मिक सुंदरता को प्रकट करती हैं। यही वो असली साधन है जिनकी हमारे जीवन में आवश्यकता है।

समस्यायें और उलझनों का सामना करते समय हमारी यही आंतरिक शक्तियाँ हमारे द्वारा शुद्ध और निर्बाध प्रतिक्रियायें व्यक्त करने में मदद करती हैं। हम अपने भीतर उलनों और नकारात्मक परिस्थितियों को समाये रखते हैं। जहाँ हमारा दु:ख और कर्म ने हमारी इन परिस्थितियों को हिंसक रूप से सामना करने की आदत बनायी है। क्रोध की हिंसा, अस्वीकृति, भय, ईर्ष्या और आवेश इन्होंने हमारी व्यक्तित्व में जग बना ली है। अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को याद करते हुए और सहनशीलता, सजगता को धारण करते हुए हम अहिंसा के साथ परिस्थितयों के प्रतिक्रियात्मक की जगह जिम्मेदार बनते जाते हैं। खारिज करने की जगह पर उनका स्वागत करते हैं तभी हमारे भीतर आन्तरिक शान्ति, मधुरता, प्रेम और दया की शक्ति की समझ बनी रहती है।