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"ज्योति जगाये और प्रकाश फैलने दें" ऐसे काली मनोवृत्ति के समय में, जब उदासीनता और मानसिक तनाव ने कईयों के जीवन को घेर रखा है ऐसे में आप कुछ नया जीवन में चाहेंगे जिससे आपके कदम बढ़ जायेंगे। कुछ ऐसा जिससे आप स्वतंत्र हो जायेंगे। कुछ ऐसा जो हमेशा से हैं। कुछ इसे ‘आत्मा' कहते हैं – स्वयं का एक शक्तिशाली स्वरूप, हमारे मन और शरीर से निकला हुआ जो हर दिन को खुशी से अभिवादन करते हुए नया बना दे।
इसी सकारात्मक शक्ति के कोश/कुण्ड को आत्मा कह सकते हैं। ये अति सूक्ष्म और अदृश्य है जो स्थूल आंखों से दिखाई नहीं देता। आध्यात्मिक शक्ति से आत्मा जगमगा उठती है। आत्मा मूलत: मधुर और प्रेम स्वरूप है। आत्मा शान्त स्वरूप है। आत्मा यादों में एक चेतना है, अद्वितीय है।

व्यक्तित्व

व्यक्तित्व अभौतिक है, आप वास्तविक रूप में आत्मा हैं। आप शरीर नहीं है। ये शरीर आपका है पर आप शरीर नहीं हैं। जिस मानव का हार्ट ट्रान्सप्लांट किया जाता है उसका स्वभाव दान किये व्यक्ति जैसा नहीं बन जाता है। हार्ट प्राप्त किये हुए व्यक्ति का व्यक्तित्व ठीक वैसा ही रहता है जैसा कि पहले था। आत्मा के संस्कार भारत में जहाँ तिलक लगाये जाते हैं यानि भृकुटि के मध्य पाये जाते हैं वा बौद्धि जिन्हें तीसरी आंख कहते हैं। हालांकि इन नयनों से आत्मा दिखती नहीं है किन्तु इसकी आंतरिक शक्ति को राजयोग के कुछ पल के अभ्यास से पुन: जागृत कर सकते हैं। यही आत्मिक शक्तियों सदियों तक चलते रहती है।

समय प्रति समय लोग कहते भी हैं कि फलाना नवजात बच्चा कोई पुरानी आत्मा लगती है। इस कथन पर यदि विचार किया जाये तो हमें लगता है कि हममें से कई इस पृथ्वी पर बहुत लम्बे समय से मानव रूप में रहते आ रहे हैं तथा यह भी जानते हैं कि यह धरती कैसे काम करती है और इसे कैसे नुकसान पहुंच सकता है, ऐसे लोगों को इसकी परवाह है वो भी गहराई से। आत्मा का अध्ययन व्यक्तिगत है क्योंकि हर आत्मा का अपना अस्तित्व और इतिहास है।

स्वयं का ध्यान रखना

अपने ध्यान रखने के हिस्से में हर दिन राजयोग अभ्यास से अपने आपको रिचार्ज कर अपनी ऊर्जा को एकत्रित करते जाना शामिल है। राजयोग हमें उस सर्वोच्च शक्ति के स्रोत के साथ जोड़ता है। बहुत से प्रसिद्ध वैज्ञानिक और प्रसारक हो सकता है इस स्रोत की मान्यता का पटाक्षेप करना चाहें परन्तु अनेकानेक लोग दैनिक प्रार्थना, चिन्तन, अपने आपमें आशावादी प्रतिज्ञायें करते रहते हैं, इसलिए  चयन हमारा अपना है, चाहे अभ्यास करें या ना करें। इस प्रतिक्रिया की शुरुआत में सोचिये मैं, प्रकाश हूँ, चमकता हुआ प्रकाश।

 


जीवन का तात्पर्य 

अपनी निजी और आंतरिक पहचान पर चिन्तन करने के लिए, अपने आपको उस आधार पर जानने के लिए और उन्हीं विचारों में रहना इसे कहा जाता है। अपने आध्यात्मिक स्व के बारे में सोचना। इसको आत्म अभिमानी स्थिति कहा जाता है।

From The Story of Immortality by Mohini Panjabi, BKIS Publications, 2008