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विभिन्न देशों में सफर करने वाले लोगों के लिए ‘संसार' – जीवन चक्र का परिचय है। जिसका लोक कथाओं में, वस्त्र व्यवसाय, मिट्टी के पात्र बनाने में वर्णन है। प्रथम सदी के मध्य में प्राचीन ग्रीस और भारत दोनों के धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में इस कल्पना को कई बार वर्णित किया गया है। हालांकि यह विचारधारा कई पुरानी संस्कृतियों के मूल में गहराई तक बसी है। यह मान्यता समकालीन तथा पाश्चात्य समय की समझ में कम प्रचलित है।

प्राचीन विचारधारा के अनुसार यह माना जाता है‍ कि सभी जीव और प्राणीमात्र एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश कर जन्म-दर-जन्म जीवन का आनन्द लेत हैं। यह पुनरावृत्ति कैसे होती है, इस बात के अनन्त संस्करण बन चुके हैं और कुछ विचारधाओं की शालायें यह भी सूचित करती हैं कि हम अनेक जीवों के बीच घूमते रहते हैं। वहीं पर कुछ अन्य लोग जैसे कि ब्रह्माकुमारीज़ समझते हैं कि हम अपने ही प्रकार के जीवन शरीर में जन्म लेते हैं अर्थात् मनुष्य हमेशा मनुष्य ही रहेंगे और हाथी हमेशा हाथी। इसी तरह अन्य जीव भी।

सभी धर्म एवं संस्कृतियों में यह एक विस्तृत समझ है कि हमारे जीवन में जो भी दु:ख या तकलीफें हैं वह हमारे अपने ही कर्मों का फल है और वैसे ही कोई भी लाभ जैसे खुशी, प्रेम और सन्तुष्टता का आधार भी कर्म है। चुनाव सर्वथ: हमारा ही है। स्वनिर्मित प्रतिक्रियायें हैं।

परम्परागत रीति से समय चक्र अपने चार भागों के साथ घूमता रहता है जो चेतना के परिवर्तन का प्रतीक है।(खासकर मनुष्य प्राणियों के संदर्भ में) उस विशेष समयावधि में देखा जाये तो चक्र की कोई शुरुआत या अन्त नहीं है। क्रिया और प्रतिक्रियाओं की एक निरन्तर एवं शाश्वत कड़ी है जिसकी गुणवत्ता हमारे अपने हाथ में है (सम्भवता: दिमाग में है)।

ऋतुओं का परिवर्तन और तत्वों में अखण्डता के साथ परिवर्तन के चलते पृथ्वी की बाह्य परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। प्रकृति के इस तरह के भ्रष्ट होने के पीछे का प्रेरक स्रोत है मनुष्य का मन। पवित्र और श्रेष्ठ स्मृति से विश्व सुदृढ़ स्मृति उसके अस्तित्व में प्रदूषण और निकृष्टता ले आती है।

जब लोग इस समय चक्र के स्मृति के साथ अपना दैनिक जीवन जीते हैं वे अपने मन में हमेशा एक वृहद चित्र को रखते हैं और समयावधि के साथ अपने विचार और कर्मों के प्रभाव के साथ तथा अपने व्यक्तिगत जीवन के साथ तालमेल बनाकर चलते हैं। इस तरह जीवन के प्रांगण में पर्वत शिखर पर खड़े होकर अपने जीवन की विहंगम दृश्य का न केवल देखने का आनन्द लेते हैं बल्कि अपने जीवन में कब और कैसे आगे बढ़ना है इस बात की समझ रखते हैं। लेकिन वो साथ-साथ जीवन की विविधता का भी सम्मान करते हैं और दूसरों का जैसा और जब वे चाहते हैं वैसा रहने की उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं। अहिंसा की समझ हरेक की आध्यात्मिक गरिमा के प्रति श्रेष्ठतम्, साक्षीभाव और उदारता को उनके व्यक्तित्व में ले आती है। हरेक अपने भाग्य का खुद ही निर्माता होता है और कालान्तर में आत्मा के मूल घर में लौटने से पहले चार युगों से होकर गुजरता है।

जैसा कि हम कहते हैं "इतिहास अपने आपको दोहराता है" वैसे ही समय चक्र भी पुरावृत्त होता है। जिसे आप राजयोग अभ्यास के आधारभूत कोर्स में अपनी नजदीकी सेवाकेन्द्र पर जाकर समझ सकते हैं।